वहां मत जाइये जहाँ रास्ता ले जाए.. बल्कि वहां जाइये जहाँ कोई रास्ता नहीं है, और वहां अपने निशान छोड़ आइये..

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

भाई दूज 2011

 28 अक्तूबर, 2011 कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के लिये भाई दूज का पर्व बडी धूमधाम से मनाया जायेगा. भाई दूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. भाई दूज पर्व भाईयों के प्रति बहनों के श्रद्धा व विश्वास का पर्व है. इस पर्व को बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक लगा कर मनाती है. और भगवान से अपने भाइय़ों की लम्बी आयु की कामना करती है.
हिन्दू समाज में भाई -बहन के स्नेह व सौहार्द का प्रतीक यह पर्व दीपावली दो दिन बाद मनाया जाता है. यह दिन क्योकि यम द्वितीया भी कहलाता है. इसलिये इस पर्व पर यम देव की पूजा भी की जाती है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन जो यम देव की उपासना करता है, उसे असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है.
हिन्दूओं के बाकी त्यौहारों कि तरह यह त्यौहार भी परम्पराओं से जुडा हुआ है. इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी आयु की कामना करती हे. बदले में भाई अपनी बहन कि रक्षा का वचज देता है. इस दिन भाई का अपनी बहन के घर भोजन करना विशेष रुप से शुभ होता है.

भाई दूज के विषय में मान्यता 
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार यमुना ने इसी दिन अपने भाई यमराज की लम्बी आयु के लिये व्रत किया था, और उन्हें अन्नकूट का भोजन खिलाया था. मिथिला नगरी में इस पर्व को आज भी यमद्वितीया के नाम से जाना जाता है. इस दिन चावलों को पीसकर एक लेप भाईयों के दोनों हाथों में लगाया जाता है. और साथ ही कुछ स्थानों में भाई के हाथों में सिदूर लगाने की भी परम्परा देखी जाती है.
भाई के हाथों में सिंदूर और चावल का लेप लगाने के बाद उस पर पान के पांच पत्ते, सुपारी और चांदी का सिक्का रखा जाता है, उस पर जल उडेंलते हुए भाई की दीर्घायु के लिये मंत्र बोला जाता है. भाई अपनी बहन को उपहार व मिठाई देते है. देश के अलग- अलग हिस्सोम में इस परम्परा में कुच न कुछ अंतर आ ही जाता है.

भाई दूज से जुडी कथा
भाई- बहनों से जुडे जितने पर्व मनाये जाते है, उनमें रक्षा-बंधन और भाई-दूज दो पर्व विशेष है. कथा के अनुसार यम देवता ने अपनी बहन को इसी दिन दर्शन दिये थें. यम की बहन यमुना अपनी बहन से मिलने के लिये अत्यधिक व्याकुल थी. अपने भाई के दर्शन कर यमुना बेहद प्रसन्न हुई. यमुना ने प्रसन्न होकर अपने भाई की बहुत आवभगत की. यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदा दिया ककि इस दिन अगर भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेगें, तो उन्हें मुक्ति प्राप्त होगी.
इसी कारण से इस इन यमुना नदी में भाई- बहन के साथ स्नान करने का बडा महत्व है. इसके अलावा यम ने यमुना ने अपने भाई से वचन लिया कि आज के दिन हर भाई को अपनी बहन के घर जाना चाहिए. तभी से भाई दूज मनाने की प्रथा चली आ रही है. जिन भाईयों की बहनें दूर होती है. व भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते है. और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते है.

भाई दूज विधि- विधान

भाई दूज पर्व पर बहनें प्रात: स्नान कर, अपने ईष्ट देव का पूजन करती है. और भाई के आने पर उसे उपयुक्त स्थान देते हुए. चावल के आटे से चौक तैयार करती है. इस चौक पर भाई को बैठाया जाता है. और उनके हाथों की पूजा की जाती है. भाई की हथेली पर बहने चावल का घोल लगाती है. उसके ऊपर सिन्दुर लगाकर कद्दु के फूल, पा, सुपारी, मुद्रा आदि हाथों पर रख कर धीरे धीरे हाथों पर पानी छोडते हुए मंत्र बोला जाता है.
कहीं-कहीं इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती है. और फिर हथेली में कलावा बांधती है. भाई का मुंह मीठा करने के लिये भाईयों को माखन - मिश्री खिलाती है. संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर दीये का मुख दक्षिण दिशा की ओर करके रख देती है. इस दिन आसमान में उड्ती हुई चील देखने के विषय में यह मान्यता है कि बहने भाईयों की आयु के लिये जो दुआ मांगती है, वह दूआ पूरी होती है.

भाई दूज पर्व का महत्व

भाई दूज पर्व क्योकि यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. यह पर्व भाई -बहन के बीच स्नेह के बंधन को और भी मजबूत करता है. भारतीय परम्परा के अनुसार विवाह के बाद कन्या का अपने घर, मायके में कभी- कभार ही आना होता है. मायके की ओर से भी परिवार के सदस्य कभी- कभार ही उससे मिलने जा पाते है. ऎसे में भाई अपनी बहन एक प्रति उदासीन न हों, उससे सदा स्नेह बना रहें, बहन के सुख:दुख का पता चलता रहें. भाई अपनी बहनों की उपेक्षा न करें, और दोनों के सम्बन्ध मधुर बने रहें. इन्ही भावनाओं के साथ भाई दूज जैसे पर्व मनाये जाते है.

गोवर्धन एवं अन्नकूट पर्व-2011


गोवर्धन पर्व प्रत्येक वर्ष दिपावली के एक दिन बाद मनाया जाता है. वर्ष 2011 में यह् पर्व 27 अक्तूबर-2011, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जायेगा. गोवर्धन पूजा के दिन ही अन्नकूट पर्व भी मनाया जाता है. दोनों पर्व एक दिन ही मनाये जाते है, और दोनों का अपना- अपना महत्व है. गोवर्धन पूजा विशेष रुप से श्री कृ्ष्ण की जन्म भूमि या भगवान श्री कृ्ष्ण से जुडे हुए स्थलों में विशेष रुप से मनाया जाता है.इसमें मथुरा, काशी, गोकुल, वृ्न्दावन आदि में मनाया जाता है. इस दिन घर के आँगन में गोवर्धन पर्वत की रचना की जाती है. श्री कृ्ष्ण की जन्म स्थली बृ्ज भूमि में गोवर्धन पर्व को मानवाकार रुप में मनाया जाता है. यहां पर गोवर्धन पर्वत उठाये हुए, भगवान श्री कृ्ष्ण के साथ साथ उसके गाय, बछडे, गोपिया, ग्वाले आदि भी बनाये जाते है. और इन सबको मोर पंखों से सजाया जाता है. और गोवर्धन देव से प्रार्थना कि जाती है कि पृ्थ्वी को धारण करने वाले हे भगवन आप गोकुल के रक्षक है, भगवान श्री कृ्ष्ण ने आपको अपनी भुजाओं में उठाया था, आप मुझे भी धन-संपदा प्रदान करें. यह दिन गौ दिवस के रुप में भी मनाया जाता है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन गायों की सेवा करने से कल्याण होता है. जिन क्षेत्रों में गाय होती है, उन क्षेत्रों में गायों को प्रात: स्नान करा कर, उन्हें कुमकुम, अक्षत, फूल-मालाओं से सजाया जाता है.

गोवर्धन पर्व पर विशेष रुप से गाय-बैलों को सजाने के बाद गोबर का पर्वत बनाकर इसकी पूजा की जाती है. गोबर से बने, श्री कृ्ष्ण पर रुई और करवे की सीके लगाकर पूजा की जाती है. गोबर पर खील, बताशे ओर शक्कर के खिलौने चढाये जाते है.


गोवर्धन पूजा कथा
गोवर्धन पूजा के विषय में एक कथा प्रसिद्ध है. बात उस समय की है, जब भगवान श्री कृ्ष्ण अपनी गोपियों और ग्वालों के साथ गायं चराते थे. गायों को चराते हुए श्री कृ्ष्ण जब गोवर्धन पर्वत पर पहुंचे तो गोपियां 56 प्रकार के भोजन बनाकर बडे उत्साह से नाच-गा रही थी. पूछने पर मालूम हुआ कि यह सब देवराज इन्द्र की पूजा करने के लिये किया जा रहा है. देवराज इन्द्र प्रसन्न होने पर हमारे गांव में वर्षा करेगें. जिससे अन्न पैदा होगा. इस पर भगवान श्री कृ्ष्ण ने समझाया कि इससे अच्छे तो हमारे पर्वत है, जो हमारी गायों को भोजन देते है.
ब्रज के लोगों ने श्री कृ्ष्ण की बात मानी और गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी प्रारम्भ कर दी. जब इन्द्र देव ने देखा कि सभी लोग मेरी पूजा करने के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा कर रहे है, तो उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगा. इन्द्र गुस्से में आयें, और उन्होने ने मेघों को आज्ञा दीकी वे गोकुल में जाकर खूब बरसे, जिससे वहां का जीवन अस्त-व्यस्त हो जायें.
अपने देव का आदेश पाकर मेघ ब्रजभूमि में मूसलाधार बारिश करने लगें. ऎसी बारिश देख कर सभी भयभीत हो गयें. ओर दौड कर श्री कृ्ष्ण की शरण में पहुंचें, श्री कृ्ष्ण से सभी को गोवर्धन पर्व की शरण में चलने को कहा. जब सब गोवर्धन पर्वत के निकट पहुंचे तो श्री कृ्ष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्का अंगूली पर उठा लिया. सभी ब्रजवासी भाग कर गोवर्धन पर्वत की नीचे चले गयें. ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं गिरा. यह चमत्कार देखकर इन्द्रदेव को अपनी गलती का अहसास हुआ. और वे श्री कृ्ष्ण से क्षमा मांगने लगें. सात दिन बाद श्री कृ्ष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजबादियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व मनाने को कहा. तभी से यह पर्व इस दिन से मनाया जाता है.

अन्नकूट पर्व

अन्नकूट पर्व भी गोवर्धन पर्व से ही संबन्धित है. इस दिन 56 प्रकार की सब्जियों को मिलाकर एक भोजन तैयार किया जाता है, जिसे 56 भोग की संज्ञा दी जाती है. यह पर्व विशेष रुप से प्रकृ्ति को उसकी कृ्पा के लिये धन्यवाद करने का दिन है. इस महोत्सव के विषय में कहा जाता है कि इस पर्व का आयोजन व दर्शन करने मात्र से व्यक्ति को अन्न की कमी नहीं होती है. उसपर अन्नपूर्णा की कृ्पा सदैव बनी रहती है.
अन्नकूट एक प्रकार से सामूहिक भोज का दिन है. इसमें पूरे परिवार, वंश व समाज के लोग एक जगह बनाई गई रसोई को भगवान को अर्पन करने के बाद प्रसाद स्वरुप ग्रहण करते है. काशी के लगभग सभी देवालयों में कार्तिक मास में अन्नकूट करने कि परम्परा है. काशी के विश्वनाथ मंदिर में लड्डूओं से बनाये गये शिवालय की भव्य झांकी के साथ विविध पकवान बनाये जाते है.

दीवाली पूजा कैसे करे 2011



दीवाली के दिन की विशेषता लक्ष्मी जी के पूजन से संबन्धित है. इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी जी के पूजन के रुप में उनका स्वागत किया जाता है. दीवाली के दिन जहां गृहस्थ और वाणिज्य वर्ग के लोग धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि और वित्तकोष की कामना करते हैं, वहीं साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिए रात्रिकाल में अपने तांत्रिक कर्म करते हैं. 26 अक्तूबर 2011 के दिन दिवाली पूजन किया जायेगा.


पूजा की सामग्री

लक्ष्मी व श्री गणेश की मूर्तियां (बैठी हुई मुद्रा में). केशर, रोली, चावल, पान, सुपारी, बताशे, सिंदूर, शहद, सिक्के, फल, फूल, दूध, खील, लौंग. सूखे, मेवे, मिठाई, दही, गंगाजल, धूप, अगरबत्ती,11 दीपक. रूई तथा कलावा नारियल और तांबे का कलश चाहिए.


कैसे करें दीपावली पूजन की तैयारी

एक थाल में या भूमि को शुद्ध करके नवग्रह बनायें या नवग्रह यंत्र की स्थापना करें. इसके साथ ही एक ताम्बें का कलश बनाएं, जिसमें गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, सिक्के और लौंग आदि डालकर उसे लाल कपडे से ढक कर एक कच्चा नारियल कलावे से बांध कर रख दें.
जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया गया है. वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए, लक्ष्मी - गणेश सरस्वती जी या ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां या चित्र सजायें. कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रुप मानकर दूध, दही ओर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रंगार करके फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने और एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें, जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है.


लक्ष्मी पूजन विधि

आप हाथ में अक्षत, पुष्प और जल ले लीजिए. कुछ द्रव्य भी ले लीजिए. द्रव्य का अर्थ है कुछ धन. यह सब हाथ में लेकर संकसंकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो. सबसे पहले गणेश जी व गौरी का पूजन कीजिए.
हाथ में थोड़ा-सा जल ले लीजिए और आह्वाहन व पूजन मंत्र (ऊँ दीपावल्यै नम:) बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए. हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए. अंत में महालक्ष्मी जी की आरती के साथ पूजा का समापन किजिये.


बही खातों का पूजन

बही खातों का पूजन करने के लिए पूजा मुहुर्त समय अवधि में नवीन बहियों व खाता पुस्तकों पर केसर युक्त चंदन से अथवा लाल कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना चाहिए. इसके बाद इनके ऊपर "श्री गणेशाय नम:" लिखना चाहिए. इसके साथ ही एक नई थैली लेकर उसमें हल्दी की पांच गांठे, कमलगट्ठा, अक्षत, दुर्गा, धनिया व दक्षिणा रखकर, थैली में भी स्वास्तिक का चिन्ह लगाकर सरस्वती मां का स्मरण करना चाहिए. इसके साथ ही निम्न मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए.


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।,
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभि र्देवै: सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।।
ऊँ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नम:

मंत्र जाप करने के बाद मां सरस्वती का ध्यान करें.
जो अपने कर कमलों में घटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती है, चन्द्र के समान जिनकी मनोहर कांति है. जो शुंभ आदि दैत्यों का नाश करने वाली है. वाणी बीज जिनका स्वरुप है, तथा जो सच्चिदानन्दमय विग्रह से संपन्न हैं, उन भगवती महासरस्वती का मैं ध्यान करता हूं. ध्यान करने के बाद बही खातों का गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्ध से पूजन करना चाहिए व निम्न मंत्र बोलें,
जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया गया है. वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए, लक्ष्मी - गणेश सरस्वती जी या ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां या चित्र सजायें. कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रुप मानकर दूध, दही ओर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रंगार करके फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने और एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें, जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है.
" ऊँ वीणा पुस्तक धारिणी सरस्वती" आपको नमस्कार हैं.

संक्षेप में कुबेर पूजन विधि

कुबेर पूजन करने के लिये प्रदोष काल व निशिथ काल को लिया जा सकता है. ऊपर दिये गये शुभ समय में कुबेर पूजन करना लाभकारी रहेंगा.
कुबेर पूजन करने के लिये सबसे पहले तिजोरी अथवा धन रखने के संदुक पर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें, और कुबेर का आह्वान करें. आह्वान के लिये निम्न मंत्र बोलें.

आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वद्र्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर।।



आह्वान करने के बाद ऊँ कुबेराय नम: इस मंत्र को 108 बार बोलते हुए धन संदूक कि गंध, पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए. साथ ही निम्न मंत्र बोलते हुए कुबेर देव से प्रार्थना करें.


धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।
भगवान् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पद:।।



इस प्रकार प्रार्थनाकर पूर्व पूजित हल्दी, धनिया, कमलगट्टा, द्रव्य, दूर्वादि से युक्त थैली तिजोरी मे रखें.

दिपावली पूजन मुहूर्त 2011

श्री महालक्ष्मी पूजन व दीपावली का महापर्व कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की अमावस्या में प्रदोष काल, स्थिर लग्न समय में मनाया जाता है. धन की देवी श्री महा लक्ष्मी जी का आशिर्वाद पाने के लिये इस दिन लक्ष्मी पूजन करना विशेष रुप से शुभ रहता है.


प्रदोष काल

वर्ष 2011 में दिपावली, 26 अक्तूबर, बुधवार के दिन की रहेगी. इस दिन चित्रा नक्षत्र, परन्तु प्रदोषकाल के बाद स्वाती नक्षत्र का काल रहेगा, इस दिन प्रीति योग तथा चन्दमा तुला राशि में संचार करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है. बुधवार की दिपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रुप से शुभ मानी जाती है.
26 अक्तूबर, 2011 बुधवार के दिन दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में सूर्यास्त 17:42 पर होगा. इस अवधि से लेकर 02 घण्टे 24 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा. इसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है. प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है. इस दिन प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों 18:46 से लेकर 20:41 का समय रहेगा. इसके बाद 19:20 से 20:58 तक शुभ चौघडिया भी रहने से मुहुर्त की शुभता में वृ्द्धि हो रही है.


प्रदोष काल का प्रयोग

प्रदोष काल में मंदिर में दीपदान, रंगोली और पूजा से जुडी अन्य तैयारी इस समय पर कर लेनी चाहिए तथा मिठाई वितरण का कार्य भी इसी समय पर संपन्न करना शुभ माना जाता है.
इसके अतिरिक्त द्वार पर स्वास्तिक और शुभ लाभ लिखने का कार्य इस मुहूर्त समय पर किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त इस समय पर अपने मित्रों व परिवार के बडे सदस्यों को उपहार देकर आशिर्वाद लेना व्यक्ति के जीवन की शुभता में वृ्द्धि करता है. मुहूर्त समय में धर्मस्थलो पर दानादि करना कल्याणकारी होगा.


निशिथ कालम

26 अक्तूबर, बुधवार के दिन निशिथ काल लगभग 20:18 से 22: 54 तक रहेगा. स्थानीय प्रदेश के अनुसार इस समय में कुछ मिनट का अन्तर हो सकता है. निशिथ काल में अम्रत की चौघडिया 20:58 से 22:36 तक रहेगी. निशिथ काल में लाभ की चौघडिया भी रहेगी, ऎसे में व्यापारियों वर्ग के लिये लक्ष्मी पूजन के लिये इस समय की विशेष शुभता रहेगी.


दिपावली पूजन में निशिथ कालम का प्रयोग

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.


  महानिशीथ कालम

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.
26 अक्तूबर, बुधवार 2011 के रात्रि में 22:54 से लेकर अगले दिन प्राप्त: 01:30 मिनट तक महानिशीथ काल रहेगा. महानिशीथ काल में कर्क लग्न भी हों, तो विशेष शुभ माना जाता है. महानिशीथ काल और कर्क लग्न 22:55 से अगले दिन प्राप्त: 01:18 मिनट तक रहेगा. महानिशीथ काल व कर्क लग्न एक साथ होने के कारण यह समय अधिक शुभ हो गया है. जो जन शास्त्रों के अनुसार दिपावली पूजन करना चाहते हो, उन्हें इस समयावधि को पूजा के लिये प्रयोग करना चाहिए.


महानिशीथ काल का दिपावली पूजन में प्रयोग

महानिशीथकाल में मुख्यतः तांत्रिक कार्य, ज्योतिषविद, वेद् आरम्भ, कर्मकाण्ड, अघोरी,यंत्र-मंत्र-तंत्र कार्य व विभिन्न शक्तियों का पूजन करते हैं एवं शक्तियों का आवाहन करना शुभ रहता है. अवधि में दीपावली पूजन के पश्चात गृह में एक चौमुखा दीपक रात भर जलता रहना चाहिए. यह दीपक लक्ष्मी एवं सौभाग्य में वृध्दि का प्रतीक माना जाता है.

दीपावली पूजन कथा 2011

लक्ष्मी पूजन कथा

एक बार की बात है, एक बार एक राजा ने एक लकडहारे पर प्रसन्न होकर उसे एक चंदन की लकडी का जंगल उपहार स्वरुप दे दिया. पर लकडहारा तो ठहरा लकडहारा, भला उसे चंदन की लकडी का महत्व क्या मालूम, वह जंगल से चंदन की लकडियां लाकर उन्हें जलाकर, भोजन बनाने के लिये प्रयोग करता था.
राजा को अपने अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तो, उसकी समझ में आ गया कि, धन का उपयोग भी बुद्धिमान व्यक्ति ही कर पाता है. यही कारण है कि लक्ष्मी जी और श्री गणेश जी की एक साथ पूजा की जाती है. ताकि व्यक्ति को धन के साथ साथ उसे प्रयोग करने कि योग्यता भी आयें.

 

लक्ष्मी जी और साहूकार की बेटी की कथा

एक गांव में एक साहूकार था, उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढाने जाती थी. जिस पीपल के पेड पर वह जल चढाती थी, उस पेड पर लक्ष्मी जी का वास था. एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूँ. लडकी ने कहा की मैं अपने पिता से पूछ कर आऊंगा. यह बात उसने अपने पिता को बताई, तो पिता ने हां कर दी. दूसर दिन से साहूकार की बेटी ने सहेली बनना स्वीकार कर लिया.
दोनों अच्छे मित्रों की तरह आपस में बातचीत करने लगी. इक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई. अपने घर में लक्ष्मी जी उसका दिल खोल कर स्वागत किया. उसकी खूब खातिर की. उसे अनेक प्रकार के भोजन परोसे,मेहमान नवाजी के बाद जब साहूकार की बेटी लौटने लगी तो, लक्ष्मी जी ने प्रश्न किया कि अब तुम मुझे कब अपने घर बुलाओगी. साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को अपने घर बुला तो लिया, परन्तु अपने घर की आर्थिक स्थिति देख कर वह उदास हो गई. उसे डर लग रहा था कि क्या वह, लक्ष्मी जी का अच्छे से स्वागत कर पायेगी.
साहूकार ने अपनी बेटी को उदास देखा तो वह समझ गया, उसने अपनी बेटी को समझाया, कि तू फौरन मिट्टी से चौका लगा कर साफ -सफाई कर. चार बत्ती के मुख वाला दिया जला, और लक्ष्मी जी का नाम लेकर बैठ जा. उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उसके पास डाल गई. साहूकार की बेटी ने उस हर को बेचकर सोने की चौकी, था, और भोजन की तैयारी की.
थोडी देर में श्री गणेश के साथ लक्ष्मी जी उसके घर आ गई. साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की, उसकी खातिर से लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुई. और साहूकार बहुत अमीर बन गया.


श्री राम का अयोध्या वापस आना

धार्मिक ग्रन्थ रामायण में यह कहा गया कि जब 14 वर्ष का वनवास काट कर राजा राम, लंका नरेश रावण का वध कर, वापस अयोध्या आये थे, उन्ही के वापस आने की खुशी में अयोध्या वासियो ने अयोध्या को दीयों से सजाया था. अपने भगवान के आने की खुशी में अयोध्या नगरी दीयों की रोशनी में जगमगा उठी थी.
एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृ्ष्ण ने दीपावली से एक दिन पहले नरकासुर का वध किया थ. नरकासुर एक दानव था और उसके पृ्थ्वी लोक को उसके आतंक से मुक्त किया था. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रुप में भी दीपावली पर्व मनाया जाता है.

राजा और साधु की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार के साधु के मन में राजसिक सुख भोगने का विचार आया. इसके लिये उसने लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करनी प्रारम्भ कर दी. तपस्या पूरी होने पर लक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वरदान दे दिया. वरदान प्राप्त करने के बाद वह साधु राजा के दरबार में पहुंचा और सिंहासन पर चढ कर राजा का मुकुट नीचे गिरा दिया.
राजा ने देखा कि मुकुट के अन्दर से एक विषैला सांप निकल कर भागा. यह देख कर राजा बहुत प्रसन्न हुआ, क्योकि साधु ने सर्प से राजा की रक्षा की थी. इसी प्रकार एक बार साधु ने सभी दरबारियों को फौरन राजमहल से बाहर जाने को कहा, सभी के बाहर जाते ही, राजमहल गिर कर खंडहर में बदल गया. राजा ने फिर उसकी प्रशंसा की, अपनी प्रशंसा सुनकर साधु के मन में अहंकार आने लगा.
साधु को अपनी गलती का पता चला, उसने गणपति को प्रसन्न किया, गणपति के प्रसन्न होने पर राजा की नाराजगी दूर हो, और साधु को उसका स्थान वापस दे दिया गया. इसी लिए कहा गया है कि धन के लिये बुद्धि का होना आवश्यक है. यही कारण कि दीपावली पर लक्ष्मी व श्री गणेश के रुप में धन व बुद्धि की पूजा की जाती है.

 

इन्द्र और बलि कथा

एक बार देवताओं के राजा इन्द्र से डर कर राक्षस राज बलि कहीं जाकर छुप गयें. देवराज इन्द्र दैत्य राज को ढूंढते- ढूंढते एक खाली घर में पहुंचे, वहां बलि गधे के रुप में छुपे हुए थें. दोनों की आपस में बातचीत होने लगी. उन दोनों की बातचीत अभी चल ही रही थी, कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से एक स्त्री बाहर निकली़, देव राज इन्द्र के पूछने पर स्त्री ने कह की मै, देवी लक्ष्मी हूं, और दैत्यों को छोड्कर, मेरी ओर अग्रसर क्यों हो रही हो. मैं स्वभाव वश एक स्थान पर टिककर नहीं रहती हूं,
परन्तु मैं उसी स्थान पर स्थिर होकर रहती हूँ, जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रह्ते है. जो व्यक्ति सत्यवादी होता है, जितेन्द्रिय होता है, ब्राह्मणों का हितैषी होत है, धम की मर्यादा का पालन करता है, उपवास व तप करता है, प्रतिदिन सूर्योदय से पहले जागता है, और समय से सोता है, दीन- दुखियों, अनाथों, वृ्द्ध, रोगी और शक्तिहीनों को सताते नहीं है.
अपने गुरुओं की आज्ञा का पालन करता है. मित्रों से प्रेम व्यवहार करता है. आलस्य, निद्रा, अप्रसन्नता, असंतोष, कामुकता और विवेकहीनता आदि बुरे गुण जिसमें नहीं होते है. उसी के यहां मैं निवास करती हूँ. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लक्ष्मी जी केवल वहीं स्थायी रुप से निवास करती है, जहां उपरोक्त गुण युक्त व्यक्ति निवास करते है.

बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

दीपावली के प्रभावशाली टिप्स 2011


दीपावली की रात सिद्धियों की रात होती है। ये सिद्धियां प्राप्त करना आम जन के लिए अत्यधिक कठिन होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यहां कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, जिन्हें दीपावली के अवसर पर अपना कर आम जन भी अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं।
टिप्स
   दीपावली के पूजन के दौरान संपूर्ण परिसर में दक्षिणावर्ती शंख से गंगाजल का छिड़काव करें, नारायण का वास बना रहेगा। जहां नारायण का वास हो, वहां लक्ष्मी स्वतः विराजमान हो जाती हैं।
   दीपावली पूजन के पश्चात्‌ संपूर्ण परिसर में गुग्गुल का धुआं दें। यह बुरी आत्माओं और आसुरी                            शक्तिओं से रक्षा करता है।
   पूजन के दौरान माता लक्ष्मी को बेलपत्र व कमल का फूल अवश्य चढ़ाएं। कुछ लोग कमल के फूल व बेलपत्र को केवल भगवान शिव हेतु उपयुक्त मानते हैं, जबकि बेलपत्र व कमल के फूल की माला लक्ष्मी को अर्पित करने से वैभव  की प्राप्ति होती है।
   पूजन के पश्चात्‌ मध्य रात्रि में परिवारजनों के साथ बैठकर श्रद्धापूर्वक श्री विष्णुसहस्रनाम अथवा श्री गोपाल सहस्रनाम तथा श्री लक्ष्मी सहस्रनाम का ११ या कम से कम एक बार पाठ अवश्य करें।                                                       
   साधक जिस मंत्र का जप नित्य करते हों, या जो उनका प्रिय मंत्र हो अथवा जिस मंत्र का जप वह भविष्य में करना चाहते हों, उसे दीपावली की रात सिद्ध कर सकते हैं। मध्य रात्रि में इस मंत्र                            का १०८ या ११ या फिर कम से कम एक माला जप संबंधित देवी देवता का ध्यान करके करें। इससे मंत्र सिद्ध हो जाएगा तथा उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
   घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के स्थायी वास के लिए दीपावली पूजन के समय श्री नारायण सूक्त व श्री सूक्त का पाठ अवश्य करें।
   दीपावली पूजन में सोने के आभूषण या सिक्के का अधिक महत्व है। इसे पूजा स्थल पर रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें, माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से घर धन-धान्य और स्वर्णाभूषणां से भरा रहेगा। सोने के अभाव में चांदी का उपयोग भी कर सकते हैं।
   दीपावली पूजन में भगवान कुबेर का पूजन अवश्य करें, घर अन्न-धन से भरा  रहेगा।
   बहुत से विद्वान दीपावली की मध्य रात्रि में बगलामुखी मंत्र सिद्धि का परामर्श देते हैं। किंतु ध्यान रहे कि यह एक परम शक्तिशाली मंत्र है, इसलिए केवल गंभीर परिस्थितियों में और किसी योग्य गुरु की देखरेख में ही इसे सिद्ध करना चाहिए।
   दीपावली के दिन वस्तुओं को लांघना अशुभ होता है। अतः इस अत्यधिक सावधानी बरतें। चौक-चौराहों को देखकर ही पार करें।
ऊपर वर्णित टिप्स आम जन को ध्यान में रखकर बताए गए हैं। लोग पंडित, पुजारी या तांत्रिक से                            मार्गदर्शन लेकर अन्य साधनाएं भी कर सकते हैं। दीपावली का मुहूर्त एक दुर्लभ और प्रभावशाली मुहूर्त होता है। अतः हर व्यक्ति को इसका लाभ उठाना चाहिए।

दीपावली पर विशेष रूप से पूज्य यंत्र एवं उनका महत्व

दीपावली प्रकाश का पर्व है। पांच दिनों का यह पर्व धनतेरस से प्रारंभ होकर भाई दूज (यमद्वितीया) समाप्त होता है।
जीवन को सुखमय बनाने के लिए लक्ष्मी अर्थात धन की आवश्यकता होती है। लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए दीपावली के शुभ अवसर पर उनके विभिन्न यंत्रों की पूजा साधना की जाती है।
   कुबेर यंत्र : धन के देवता कुबेर सभी यक्षों, गंधर्वों और किन्नरों के अधिपति   हैं। ये नौ निधियों पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील एवं वर्चसु के भी स्वामी हैं। हर निधि अनंत वैभवों की प्रदाता मानी गई है और राजाधिराज कुबेर तो गुप्त और प्रकट संसार के समस्त वैभवों के स्वामी हैं ही।
कुबेर का स्वररूप एवं उपासना
भगवान कुबेर के एक मुख्य ध्यान श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजित दिखाया गया है। सभी निधियां इनके समीप स्थापित हैं। इनके एक हाथ में भव्य गदा है तथा दूसरा हाथ धन प्रदान करने की वर मुद्रा में उठा हुआ है। इनका शरीर स्थूल और उदर उन्नत है। ये भगवान शिव के मित्र हैं, हर व्यक्ति को इनका ध्यान करना चाहिए।
श्री विद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्री तत्व निधि तथा विष्णुधर्मोत्तराधि पुराणों में कुबेर उपासना के मंत्र, यंत्र, ध्यान आदि का उल्लेख है। इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदाक्षरात्मक छोटे बड़े अनेक मंत्र हैं। यहां प्रसंगवश उनके विभिन्न मंत्रों से विभिन्न यंत्रों की उपासना का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
अष्टाक्षर मंत्र : ÷÷ओम वैश्रवणाय स्वाहा।''
पंचत्रिंशदाक्षर मंत्र : ÷÷ ओम ÷यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्यादिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।''
दुख दारिद्र्‌य से मुक्ति हेतु कुबेर मंत्र और यंत्र का क्रमशः विधिवत जप और पूजन, ध्यान तथा उपासना करें। जप और उपासना से आपदाओं से रक्षा भी होती है।
कनकधारा यंत्र
आज के युग में हर व्यक्ति शीघ्रातिशीघ्र धनवान बनना चाहता है। धन प्राप्ति हेतु कनकधारा यंत्र के सामने बैठकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इस यंत्र की उपासना से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती है। साथ ही बेरोजगारों को रोजी मिलती है और व्यापारियों के व्यापार में उन्नति होती है। कनकधारा स्तोत्र की रचना ही कुछ इस प्रकार से गुच्छित है कि एक विशेष अलौकिक दिव्य प्रभाव उत्पन्न होता है। यह यंत्र अत्यंत दुर्लभ परंतु लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण और यह स्तोत्र अपने आप में अचूक, स्वयंसिद्ध तथा ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ है। इस यंत्र की उपासना से रंक भी धनवान हो जाता है। परंतु इसकी प्राण प्रतिष्ठा की विधि जटिल है। इस जटिल विधि के कारण इसे कम ही लोग सिद्ध कर पाते हैं। कथा है कि जगद्गुरु शंकराचार्य ने एक दरिद्र ब्राह्मण के घर इस स्तोत्र का पाठकर स्वर्ण वर्षा कराई थी। प्रसिद्ध गं्रथ शंकर दिग्विजय के चौथे सर्ग में इस घटना का उल्लेख है।
मंत्र- ÷ ओम वं श्रीं वं ऐं ह्रीं-श्रीं क्लीं कनक धारयै स्वाहा'
लक्ष्मी यंत्र
यह यंत्र बुधवार को घर में स्थापित करना चाहिए। दीपावली की रात इस यंत्र पर गुलाब के २१ फूल रखकर निम्नोक्त मंत्र का जप करने से दरिद्रता दूर होती है।
मंत्र- ÷÷ ओम श्रीं श्रियै नमः।''
अष्टलक्ष्मी यंत्र
शीघ्र धनलाभ के लिए दीपावली की रात अष्टलक्ष्मी यंत्र की स्थापना कर शंख की माला से निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।
मंत्र- ÷÷ ओम श्रीं अष्टलक्ष्म्यै दारिद्र्‌य विनाशिनी सर्व सुख समृद्धिं देहि देहि ह्रीं ओम नमः।''
व्यापार में शीघ्र वृद्धि हेतु सिद्ध
बीसा यंत्र
व्यापार में वृद्धि और उन्नति के लिए इस यंत्र को दीपावली के दिन लक्ष्मी गणेश के पूजन स्थान के समीप या दुकान अथवा फैक्ट्री में स्थापित कर इसका धूप, दीप आदि से पूजन अर्चन करना चाहिए।